टीकमगढ़ ।जिले भर में ऐसे कई स्थान है जहां प्राचीन कुआं और बावडि़या धराशाही हो चुकी है और उनकी कोई सुध लेने वाला नहीं है अगर इन प्राचीन कुओं और बावडि़यों का जीर्णोद्धार हो जाए तो यह तमाम प्रकार के जल संकट को दूर कर सकते हैं इसी को लेकर पुरातत्व विभाग की टीम काम कर रही है और इसी क्रम में पुरातत्व विभाग की टीम भोपाल से टीकमगढ़ आई और पुराने किलो में स्थित कुआं बावरी का निरीक्षण परीक्षण किया बताया गया कि जिले के प्राचीन जल स्रोतों और ऐतिहासिक किलों में बनी बावड़ियों का सर्वे चल रहा है। इसी क्रम में
रविवार 03 नवंबर 2024 को पुरातत्व विभाग की टीम भोपाल से आकर टीकमगढ़ पहुंची और जिले के अलग-अलग गांव में बने प्राचीन जल स्रोतों का निरीक्षण किया।अब टीम इसकी रिपोर्ट विभाग को सौंपेगी। इसके बाद प्राचीन जल स्रोतों और बावडियों के जीर्णोद्धार की रूपरेखा तैयार की जाएगी। ग्राम पंचायत केशवगढ के सरपंच प्रतिनिधि पुष्पेंद्र जैन ने बताया कि पुरातत्व विभाग की टीम ने गांव के प्राचीन किले में बनी ऐतिहासिक बावड़ी का निरीक्षण किया। भोपाल से आई टीम में शामिल वैष्णवी प्रशांत ने बताया कि पिछले दो दिनों के दौरान पुरानी खंडहर पड़ी 6 बावड़ियों का निरीक्षण किया गया है।उन्होंने बताया कि कुराई गांव की बावड़ी, दिगौड़ा का किला और बावड़ी, मोहनगढ़ का किला बावड़ी और केशवगढ़ की बावड़ी का निरीक्षण किया गया। सालों से इनकी देखरेख पर ध्यान नहीं दिया गया है। जिसके चलते प्राचीन जल स्रोत और बावड़ी दुर्दशा का शिकार हो रहे हैं। जबकि कई जल स्रोत और बावड़ी ऐसे हैं, जिनमें आज भी काफी मात्रा में पानी है। केशवगढ़ ग्राम पंचायत के सरपंच प्रतिनिधि पुष्पेंद्र जैन ने प्रेस को जानकारी देते हुए बताया कि राजशाही दौर में जल संरक्षण के लिए अत्याधुनिक तकनीक से बावड़ियों का निर्माण किया गया था। वर्तमान में कई जल स्रोत अस्तित्व खो चुके हैं। कई जल स्रोत ऐसे हैं, जिनमें काफी मात्रा में पानी है। लेकिन देखरेख के अभाव में अनुपयोगी पड़े हैं। पुरातत्व विभाग की टीम में सम्मिलित वैष्णवी प्रशांत ने बताया कि फिलहाल पुराने जल स्रोतों और बावड़ियों का रिसर्च करने आए हैं। निरीक्षण के बाद इसकी एक रिपोर्ट तैयार कर विभाग को सौंप जाएगी। इसके बाद जल स्रोतों के संरक्षण और रखरखाव को लेकर कार्य योजना शुरू होगी। पुरातत्व विभाग भोपाल की टीम में सम्मिलित वैष्णवी प्रशांत के अनुसार केशवगढ़ सहित जिले के ऐसे और अन्य स्थान हैं जहां इस प्रकार की बावडि़यां स्थित है अगर इनमें सुधार और उनका रखरखाव किया जाए तो जल संकट से निवटा जा सकता है और यह जल की पूर्ति करने में भी सक्षम हो सकेंगींं।

