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नागपंचमी त्योहार पर श्रद्धालुओं ने नाग देव की पूजा अर्चना कर मांगी सुख संवृद्धि


0 नाग पंचती पर्व पर चौसरिया समाज ने धूमधाम से निकाली शोभा यात्रा
शुभ न्यूज महोबा। श्रावण मास के पाँचवें दिन नाग देवता के सम्मान में मनाए जाने वाले पर्व नागपंचमी में सुबह से ही श्रद्धालुओं अपने अपने घरों में सारी तैयारियों को पूर्ण करते हुए विधि विधान के साथ पूजा अर्चना की। दोपहर बाद चौरसिया समाज के अलावा नाग भक्तों द्वारा पान मंडी से शोभा यात्रा निकाली गई, जो शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए नागोरिया मंदिर पहुंचकर समाप्त हुई। वहीं नागपंचमी के दिन शहर के रामकुंड और ग्राम रहेलिया में मेले का आयोजन किया गया, जहां पर ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा शहरी लोगों ने पहुंचकर मेला का आनंद लिया साथ ही रहेलिया में आयोजित दंगल प्रतियोगिता में दर्शकों ने पहलवानों की जोर आजमाईश देख दंगल का लुत्फ भी लिया। 


नाग पंचमी त्योहार पर घरों के अलावा नागौरिया मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा नाग देवता की पूजा अर्चना कर सुख सवृद्धि की प्रार्थनाएं की गई। नाग देवता की पूजा के लिए सुबह से ही नागारिया मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटी। मंदिर परिसर में हवन, भजन, कीर्तन और प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया। गोखारगिरि स्थित नागौरिया मंदिर में नाग पंचमी के दिन एक अलग नजरा देखने को मिला। मंगलवार की दोपहर चौरसिया समाज और श्रद्धालुओं द्वारा शहर की पान मंडी से शोभा यात्रा निकाली, जो सुुभाष पुलिस चौकी, ऊदल चौक, आल्हा चौक, तहसील चौराहा, मुख्य बाजार सहित अन्य परम्परागत मार्गों से होते हुए प्राचीन नागोरिया मंदिर पहुंच कर समाप्त हुई। शोभा यात्रा में नाग कन्या, वीर कालू मामा, नाग बाबा आदि की झांकियां शामिल रही और सबसे आगे अश्व नृत्य व बैंडबाजों की धुन पर युवा थिरकते चल रहे थे। झांकी में लोग हाथों में नाग देवता और पान के चिन्ह बने हए झंडे लेकर चलते दिखाई दिए। 


नागपंचमी पर निकाली गई शोभा यात्रा के समापन के बाद सभी लोग मूर्ति लेकर नागौरिया मंदिर पहुंचे, जहां पर पूजा अर्चना करने के बाद देर शाम को वापस घर लौटे। नागपंचती पर्व के मौके पर रामकुंड में भी भव्य मेले आयोजन किया गया, जहां पर झूले और दुकानों को सजाया गया। महिलाओं ने दुकानों से खरीददारी की और बच्चों ने झूलों का आनंद उठाया। वहीं ग्राम रहेलिया में भी मेला का आयोजन किया गया जहां पर दंगल प्रतियोगिता का दर्शकों द्वारा आनंद भी लिया।  महोबा में नाग पंचमी का एक अलग ही महत्व है। आल्हा ऊदल की वीरता के साथ महोबा अपने देसावरी पान के लिए देश में ही नहीं विदेश में जाना जाता है। पान की खेती करने वाले चौरसिया समाज के लोगों का मानना है कि नाग देव पान बेल की रक्षा करते है, इसलिए नाग देवता उनके आराध्य के रुप में पूजे जाते हैं, जिस कारण बुंदेलखंड में नाग पंचमी पर्व की विशेष महत्व है। 



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सांई कालेज के प्राचार्य डा0 एलसी अनुरागी ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार हर एक वर्ष श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। हिंदू धर्म में नाग पंचमी के प्रमुख त्योहार है और यह पर्व सावन के महीने में मनाया जाता है। नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा उपासना करने पर नाग देवता के साथ भोले भंडारी भी प्रसन्न होते हैं। नाग पंचमी के पर्व पर सभी प्रमुख नाग मंदिरों में नाग देवता की पूजा होती है। जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प संबंधी दोष होता है तो इससे मुक्ति पाने के लिए नाग पंचमी के दिन उपाय किए जाते हैं। बताया कि शहर में प्राचीन काल से ही नागौरिया मंदिर में पूजा अर्चना करने की परंपरा चली आ रही है। 


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नागपंचमी पर्व पर नागदेवता को पिलाते हैं दूध

राजा जनमेजय की सांप के काटने से मौत हो जाने के बाद राजा के पुत्र ने सर्प यज्ञ करके तमाम सांपों को मार डाला था। जबकि जीवों का पृथ्वी पर रहना फायदेमंद होता है, लेकिन सांपों की हो रही मौत से जीवों का प्राकृतिक अनुपात गड़बड़ा गया। प्रकृति जीवों से सृष्टि विहीन न हो जाए इसलिए नागपंचमी के जरिए नाग को दूध पिलाकर यह संदेश दिया गया कि नाग देवता को मारना नहीं बल्कि उन्हें दूध पिलाना है। यही वजह है कि नाग पंचमी पर्व पर लोग सांपो को दूध पिताले हैं। सपेरे भी नागों को लेकर निकल पड़ते हैं, जिनकी पूजा करने के साथ साथ नागों के सामने दूध रख दिया जाता है। नागों को दूध पिलाने का प्रायाः यह मतलब है कि नाग की किसी भी तरह से हत्या न की जाए।
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पान के स्वाद से महरूम रहे पान के शौकीन
नाग देवता चौरसिया समाज के लोगों के लिए आराध्य है, जिस कारण यह लोग धूमधाम के साथ नागपंचमी पर्व मनाते है। नागपंचती पर्व होने के कारण मंगलवार को चौरसिया समाज के लोगों ने अपनी अपनी पान की दुकाने नहीं लगाई जिससे पान मंडी में सन्नाटा पसरा रहा। वहीं शहर में संचालित पान की दुकानें भी बंद होने के कारण पान के शौकीनों को पान न मिलने से परेशान रहे। नाग पंचती त्योहार पर चौरसिया समाज के लोग न तो बरेजे से पान न तोड़ते और न ही पान की बिक्री करते हैं, जिसके चलते लाखों रुपये का प्रतिदिन होने वाला पान कारोबार बंद रहा और पान खाने वालों को पान के स्वाद से महरुम रहना पड़ा।





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