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अज्ञात वास दौरान अर्जुन के इंदनील पर्वत पर जाने के बाद द्रोपदी ने रखा था करवा चौथ का व्रत



0 करवा चौथ पर विशेष

शुभ न्यूज महोबा। 

डॉ. एलसी अनुरागी । भारतीय संस्कृत में करवा चौथ व्रत नारी शिक्षा नारी के कर्तव्य पालन व अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। करवाचौथ व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को श्रद्धापूर्वक सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं। अर्जुन बारह वर्ष के वनवास काल के बाद एक वर्ष के अज्ञातवास दौरान इंदनील पर्वत तप करने चले गए और कई दिनों तक नहीं लौटे, तब श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को करवा चौथ व्रत रखने को कहा था। द्रोपदी ने व्रत रखा और अर्जुन सुरक्षित वापस आ गए थे। एक कथानुसार वीरावती का करवाचौथ व्रत खंडित हो गया था, तब उनके पति बीमार रहने लगे और उसी समय पृथ्वी लोक पर इंद्राणी आई। इंद्राणी के कहने पर बीरावती ने करवाचौथ व्रत रखा, जिससे उनके पति निरोगी हो गए और तभी से करवाचौथ व्रत का प्रचलन हुआ।
यह जानकारी गोरखगिरि परिक्रमा समिति के डॉ. एलसी अनुरागी ने करवाचौथ की पूर्व संध्या पर एक भेंट वार्ता दौरान दी। उन्होंने बताया कि भारतीय नारी पति को परमेश्वर मानती है, यह व्रत नारी धर्म नारी शिक्षा की सीख देता है। करवाचौथ व्रत के माध्यम से नारियां अपने परिवार को सदा सुखी रखना चाहती हैं। उन्होंने बताया कि सती अनसुइया ने सीताजी को जो नारी धर्म की शिक्षा दी थी वह अनुकरणीय है। अनसुइया ने सीता को बताया था कि माता पिता भाई केवल एक सीमा तक ही हित कर सकते हैं, लेकिन पति तो स्त्री को असीम सुख देने वाला होता है। धैर्य धर्म मित्र और स्त्री इन चारो की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है।
उन्होंने बताया कि अनसुइय ने सीता को चार प्रकार की पतिव्रता नारियों के बारे में बताया कि उत्तर श्रेणी की पतिव्रता के मन में उसके पति के अलावा दूसरा कोई पुरुष स्वप्न में भी नहीं होता। मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराये पति को अपने सगे भाई, पिता या पुत्र के रुप में देखती है। जो धर्म का विचार कर अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है वह निम्नश्रेणी की स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है जगत में उसे अधम स्त्री के रुप में जाना जाता है। रामचरित मानस के अख्यकांड में तुलसीदास ने लिखा है कि धीरज धर्म मित्र और नारी, आपदकाल परिवहिं चारी। एकइ धर्म एक व्रत नेमा, काय वचन मन पति पद प्रेमा। उन्होंने कहा कि करवा चौथ व्रत में जिस तरह भारतीय नारी पति सेवा का व्रत लेती है उसी तरह पुरुषों को भी मर्यादा पुरूषोत्तम राम के आदर्शों का एक पत्नी व्रत का पालन करना चाहिए, तभी जीवन में स्थाई सुख शांति रहेगी।


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