मुहर्रम पर शहर में शांति पूर्ण तरीके से निकाले गए ताजि़ए, या हसन या हुसैन के नारे लगाते हुए निकले हुसैनी दीवाने, असामाजिक तत्वों पर नजर रखने चप्पे-चप्पे पर रही पुलिस मौजूद
छतरपुर। हक और बातिल (इंसाफ और झूठ) की लड़ाई में जीत हुसैनियत की हुयी। हजरत इमाम हुसैन आली मकाम ने आज से करीब 1376 साल पहले दीन-ए-मोहम्मदी तथा मजहब-ए-इस्लाम को जिन्दा रखने के खातिर मोहर्रम की दसवीं तारीख को करबला में अपने 72 साथियों और खानदान वालों के साथ लड़ते-लड़ते शहदत के जाम को पी लिया, लेकिन यजीद के हाथ में हाथ नहीं दिया। न जाने क्यों मेरी आंखों में आ गए आंसू, सिखा रहा था मैं बच्चें को कर्बला लिखना। हजरत इमाम हुसैन आली मकाम की याद में दुनिया भर के मुसलमान मोहर्रम पर याद-ए-हुसैन मनाते है। मुरझा न जाये फिर कहीं इस्लाम का सजर, इस्लाम को है फिर से जरूरत हुसैन की। नौवीं और दसवीं मुहर्रम पर शहर में शांति पूर्ण तरीके से ताजिए निकाले गए। अलम व ताजि़ए लेकर या हसन या हुसैन के नारे लगाते हुए हुसैन के दीवाने शहर में निकले। शहर के मुहल्लों के ताजिए चौक बाजार और महल मैदान में एकत्रित हुए जहां पर हुसैनी अकीदतमंदों की भारी भीड़ रही। तो वहीं एसपी अगम जैन के निर्देशन में असामाजिक तत्वों पर नजर रखने के लिए चौक बाजार, महल तिराहा सहित चप्पे चप्पे पर पुलिस मौजूद रही। इस दौरान एएसपी विक्रम सिंह, सीएसपी अमन मिश्रा, सिटी कोतवाली थाना प्रभारी अरविंद कुजूर, सिविल लाइन थाना प्रभारी बाल्मीक चौबे, ओरछा रोड थाना प्रभारी पुष्पेंद्र यादव सहित अन्य थानों के थाना प्रभारी व पुलिस बल मौजूद रहा।
अगर हम मार्क-ए- कर्बला की हकीकत को देखे तो हजरत आली उनके साहबजादे, भतीजे, भांजे, सब शहीद हो गये सिर्फ हजरत इमाम हुसैन आली मकाम के साहबजादे इमाम जैनुल आबदनी ही बचे थे। इमाम जैनुल आबदीन से पूरी दुनिया के करोड़ों की तादाद में उनकी नस्ल आज भी मौजूद है, लेकिन यजीद की न नस्ल बाकी रह गई और न आज उसका कोई नाम लेवा है। मिट्टी में मिल गया इरादा यजीद का, लहरा रहा है आज भी परचम हुसैन का।


