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श्रीभागवत गीता में काम क्रोध लोभ को बताया गया नर्क का द्वार


0 11 दिसम्बर को गीता जयंती पर विशेष
डा0 एलसी अनुरागी की कलम से......
शुभ न्यूज महोबा। श्रीमद् भागवत गी
ता भारतीय संस्कृति की आत्मा है, इसमें अठारह अध्याय व 700 श्लोक हैं। भगवान कृष्ण ने कुरूक्षेत्र में अर्जुन को गीता ज्ञान दिया था, जिससे अर्जुन अन्याय के विरुद्ध युद्ध करने के लिए तैयार हुए थे। श्रीकृष्ण ने लगभग 45 मिनट में 700 श्लोक बोले और यही श्लोक गीता है। आज का मनुष्य भी माया मोह तथा लोभ लालच की चकाचौंध में इस कदर डूब गया है कि उसे सत्य की अनुभूमि नहीं होती है। उक्त बात 11 दिसम्बर को होने वाली गीता जयंती से पूर्व एक वार्ता में वीरभूमि राजकीय स्नाकोत्तर महाविद्यालय के पूर्व प्रवक्ता डा0 एलसी अनुरागी ने कही।
उन्होंने बताया कि गीता के अध्याय 16 के श्लोक संख्या 4 में बताए गए छह अवगुण दम्भ, दर्प अभिमान क्रोध कठोरता तथा अज्ञान के जाल में फसा रहता है कि जो पुरूष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी मनमानी करता है, मनमाने आचरण दिखाता है वह न तो सिद्धि को प्राप्त करता और न ही सुख और परमगति प्राप्त करता है। उन्होंने श्लोक सुनाते हुए कहा कि (यः शास्त्रविधि मुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धि मवाजोति न सुखं न परां गतिम्।) भगवान कृष्ण अर्जुन को सुखी जीवन का मंत्र बताते हुए कहते हैं कि जो किसी से द्वेष नहीं करता लेकिन सभी जीवों का दयायु मित्र है जो अपने को स्वामी नहीं मानता ओर मिथ्या अहंकार से मुक्त है जो सुख दुख में समभाव रहता है सहिष्णु है। सदैव आत्मसंतुष्ट रहता है, आत्मा संयमी है तथा जो निश्चित के साथ मन तथा बुद्धि को स्थिर करके भक्ति में लगा रहता है ऐसे भक्त मुझे प्रिय है। गीता के 12, 13 14 में महाभारत में बारह दोष बताते जो काम क्रोध लोभ मोह असंतोष, निर्दयता असूया अभिमान शोक स्मृहा, ईर्ष्या और निंदा है जिसे त्याग देना चाहिए। तभी उसे वास्तविक शुभ शांति मिलेगी, लेकिन क्रोध लोभ और काम को नहीं छोड पा रहा है।
पूर्व वक्ता डा0 अनुरागी ने बताया कि भागवान कृष्ण गीता के सालहवे अध्याय के श्लोक संख्या 21 में काम क्रोध लोभ को नरक का द्वार बताते हुए कहते हैं कि (त्रिविधं नरकस्ययेंदं दारं नाशनमात्मनः। कामः क्राधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत।) काम वासना मनुष्य का प्रबल शत्रु है। श्रीमद् भागवत महापुरण मेंवर्णित राजा ययाति ने अपने पुत्र की जवानी लेकर एक हजार वर्ष तक विषय भोग किया,  लेकिन तृष्णा नहीं मिटी, बल्कि दुख बढ़ता ही गया। बताया कि गोस्वामी तुलसी दास ने भी रामचरित मानस के सुंदरकांड में काम क्रोध लोभ को नरक का द्वार बताया है। (काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ सब परिहरि रघुवीरहिं, भजहु भजहिं जोहि संत) गीत के अनुसार वास्तविक सुख शांति आत्म संतोष में है। श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन को समझाते हुए कहते है कि जिसकी आत्मा में रति है, जो आत्मा में हो तृप्त है तथा आत्मा में ही संतुष्ट है उसके लिए किसी कर्तव्य पालन की आवश्यकता नहीं है। श्लोक ( यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृत्पश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते) गीता के चौथे अध्याय के श्लोक संख्या 22 व 23 कहा गया कि मनुष्य को आत्मसंतोष करना चाहिए तभी वास्तविक सुख शांति मिलती है। पूर्व वक्ता ने बताया कि कबीर भी आत्मसंतोष अपनाने के लिए कहते हैं गोधन गजधन बाजि धन और रतन धन खान, जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान। उन्होंने गीता जयंती पर हमे भगवान कृष्ण की शरण में रहकर मानव सेवा का व्रत लेना चाहिए।


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