0 मकर संक्रांति त्योहार को लेकर विशेष
फोटो एमएएचपी 04 परिचय- मकर संक्रांति पर रामकुंड में लगाई जाती बुड़की।
शुभ न्यूज महोबा। भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति त्योहर का विशेष महत्व है। संक्रांति का अर्थ सूर्य या किसी भी ग्रह की एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश या संक्रमण है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है। संक्रांति से आठ घंटे पहले और आठ घंटे बाद तक पुन्यकाल होता है। इस अवधि में नदियों, तालाबों, पोखरों में स्नान का एक अलग महत्व है। मकर संक्रांति को बुंदेलखंड में धूमधाम से मनाय जाता है। मकर संक्रांति पर्व पर महोबा के गोरखगिरि पर्वत की तलहटी में बने शिवतांडव मंदिर में खिचड़ी चढाए जाने की परम्परा आज भी कायम है।
उक्त जानकारी राजकीय वीरभूमि महाविद्यालय के प्रवक्ता डा0 एलसी अनुरागी ने मकर संक्रांति पर्व पर विशेष विज्ञप्ति के माध्यम से दी। उन्होंने बताया कि बुंदेलखंड के कालिंजर दुर्ग, भूरागढ़ दुर्ग, जटाशकर व गुरु गोरखनाथ की तपो स्थलीय भूमि महोबा के गोरखगिरि पर्वत के उत्तर दिशा में स्थित रामकुंड तीर्थ में मकर संक्रांति पर्व पर मेले का आयोजन किया जाता है। मकर संक्रांति बुंदेलखंड ही नहीं पूरे भारत का सबसे बड़ा पर्व है, जिसे बिहार में खिचड़ी, दक्षिण भारत में पोंगल, असम में बिहू, पंजाब में लोहिड़ी आदि नामों से मनाया जाता है साथ ही इस दिन भारत का सबसे बड़ा मेला पश्चिम बंगाल के गंगा सागर तीर्थ पर लगता है। उन्होंने बताया कि बुंदेलखंड में मकर संक्रांति त्योहार पर विशेष उत्साह देखने को मिलता है।
उन्होंने बताया कि बुंदेलखंडी मकर संक्रांति पर्व पर टोली बनाकर प्रातः बुंदेली संस्कृति के लमटेरा गीत सपर लइयो काशी जी की झिरियां रे, काशी जी की झिरियां कट जैहे, जनम के पा रे... गाते हुए बुड़की लगाने जाते हैं। मकर संक्रांति पर्व पर महोबा के रामकुण्ड तीर्थ में बुड़की(स्नान) लगाने वाले श्रद्धालु भी बुंदेली लमटेरा गीत गोरखगिरि में रामकुंड तीरथ रे, रामकुंड तीरथ, ब्राजे जहां उपंगेश्वर महाराज रे... गाते हैं। उन्होंने बताया कि मकर संक्रांति पर्व पर स्नान के बाद दान, पुन्य, भजन, सत्संग का बहुत महत्व है। इस दिन ओम सूर्य नमः, ओम हिरण्यगभयि नमः, ओम मारिचाये नमः सहित सूर्य चालीसा, सूर्य मंत्र आदि के पाठ करने से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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लोग भुलते जा रहे बुंदेली गीतों की विधा
डा0 लालचंद्र अनुरागी का कहना है कि आज लोग भारतीय संसकृति के बुंदेली गीतों की विधा को भूलते जा रहे हैं। समय रहते संस्कृति विभाग को बुंदेली विधाओं पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कराकर बुंदेली सहित्य के लेखकों, साहित्यकारों को मंच के माध्यम से प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है, जिससे विलुप्त हो रही बुंदेली गीतों और परम्पराओं को बचाया जा सके।
