टीकमगढ़। बुंदेलखंड का एक ऐसा जिला, जहां सदियों से जल संरक्षण की समृद्ध परंपरा रही है, आज इस धरोहर को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। टीकमगढ़ में देश की पहली तालाब विश्वविद्यालय (पॉन्ड यूनिवर्सिटी) की स्थापना होनी चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्र प्राचीन काल से तालाबों के वैज्ञानिक प्रबंधन का केंद्र रहा है। कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए जल सहेली फाउंडेशन के संस्थापक डॉ संजय सिंह ने बताया कि कभी टीकमगढ़ और निवाड़ी में 1,040 चंदेलकालीन तालाब हुआ करते थे,
लेकिन वर्तमान में मात्र 500 तालाब ही शेष हैं। यह दर्शाता है कि जल संरक्षण की पारंपरिक व्यवस्थाएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं, जिन्हें पुनर्जीवित करना अनिवार्य है। देश में पशुपालन, कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन से जुड़ी विश्वविद्यालयें मौजूद हैं, लेकिन जल संरक्षण के सबसे बड़े स्रोत—तालाबों—पर कोई समर्पित विश्वविद्यालय नहीं है। जबकि, धरती पर नदियों और समुद्र के बाद जल संचयन का सबसे बड़ा केंद्र तालाब ही होते हैं। टीकमगढ़ इस परंपरा का ऐतिहासिक केंद्र रहा है, जहां लगभग 1,000 साल पहले जल प्रबंधन की उत्कृष्ट प्रणाली विकसित की गई थी। टीकमगढ़ नगर के आठ तालाबों का आपस में एक जलसंरचनात्मक नेटवर्क था, जो पूरे जिले के अन्य तालाबों से भी जुड़ा हुआ था। यह तालाबों की पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणाली का अनूठा उदाहरण है। तालाबों के महत्व को समझते हुए 2012 में सरकार द्वारा पहली बार नदी से तालाबों को जोड़ने की योजना यहीं से शुरू की गई थी। जामनी नदी से जल उठाकर हरपुरा कैनाल में डाले जाने की यह योजना इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का एक हिस्सा थी। टीकमगढ़ के तालाबों के पुनर्जीवन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन वर्तमान में कुछ प्रमुख चुनौतियाँ भी हैं। तालाबों में गाद (सिल्ट) की समस्या बढ़ रही है, जिससे जल संग्रहण क्षमता घटती जा रही है। सिर्फ गाद हटाना ही समाधान नहीं है, बल्कि तालाबों के जलस्तर को बढ़ाना अधिक महत्वपूर्ण है। वर्षाजल के प्रवाह को तालाब तक पहुंचाने के लिए पारंपरिक मार्गों को पुनर्जीवित करना होगा। इसके अलावा, अतिक्रमण के कारण कई तालाब अपने मूल स्वरूप में नहीं रहे, जिन्हें संरक्षित करना आवश्यक है। पर्यावरणीय सुधार के लिए तालाबों के किनारों पर चौड़ी पत्ती वाले पेड़ लगाए जाने चाहिए, ताकि सूर्य की सीधी किरणों को रोका जा सके और वाष्पीकरण की दर को कम किया जा सके। यदि सरकार वास्तव में जल प्रबंधन को सुदृढ़ करना चाहती है, तो टीकमगढ़ में एक तालाब विश्वविद्यालय की स्थापना आवश्यक है। यह विश्वविद्यालय पारंपरिक जल विज्ञान, आधुनिक जल संरक्षण तकनीकों और सामुदायिक सहभागिता के अध्ययन का केंद्र बनेगा। इससे प्राप्त ज्ञान का उपयोग पूरे देश में जल संरक्षण के लिए किया जा सकेगा और अन्य क्षेत्रों में भी जल प्रबंधन को प्रभावी बनाया जा सकेगा। तालाबों के संरक्षण और जल संकट से निपटने में जल सहेलियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इन ग्रामीण महिलाओं ने बुंदेलखंड में कई तालाबों को पुनर्जीवित किया है और जल संरक्षण को एक जन आंदोलन बनाया है। उनकी जल यात्रा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे न केवल स्थानीय लोगों को जागरूक किया जा रहा है, बल्कि पूरे देश में जल सहेलियों की इस अनूठी पहल को एक मॉडल के रूप में स्थापित किया जा रहा है। जल सहेलियों के प्रयासों से झांसी जिले के लहर ठाकुरपुरा गांव में चंदेलकालीन तालाब को पुनर्जीवित किया गया। यह तालाब सिल्ट और जलकुंभी के कारण अनुपयोगी हो गया था, लेकिन जल सहेलियों के अथक प्रयासों से इसे साफ किया गया और जलधारण क्षमता को बढ़ाया गया। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव दयाशंकर मिश्र ने भी इस प्रयास की सराहना की थी। इसी प्रकार, ललितपुर जनपद के बनगुवाँ गांव के चंदेलकालीन तालाब को भी जल सहेलियों ने पुनर्जीवित किया था। यह तालाब वर्षों से उपेक्षित था, लेकिन जल सहेलियों ने इसे फिर से जल संग्रहण के योग्य बनाया, जिससे गांव में जल संकट से राहत मिली। टीकमगढ़ को तालाबों का मॉडल जिला बनाना आवश्यक है। इसके लिए एक समर्पित तालाब विश्वविद्यालय की स्थापना की जानी चाहिए, जो पारंपरिक और आधुनिक जल संरक्षण तकनीकों को एकीकृत कर पूरे देश के लिए उदाहरण बने। जल सहेलियों की भागीदारी से इस प्रयास को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। सरकार से आग्रह है कि इस प्रस्ताव को प्राथमिकता देते हुए टीकमगढ़ में तालाब विश्वविद्यालय की स्थापना को शीघ्र मंजूरी प्रदान करें।
इस दौरान जल सहेली पुष्पा देवी, सिने अभिनेता आरिफ सहडोली, समाजसेवी मनीष राजपूत ने भी अपने
विचार रखे ।

