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मनुष्य अपने अहंकार को त्याग कर सच्ची भक्ति से प्रभु को कर सकता है प्राप्तः डा0 अनुरागी



0 संत कबीर आश्रम में आयोजित किया गया अमृतवाणी सत्संग कार्यक्रम
शुभ न्यूज महोबा। एक सूर्य है एक चांद व एक पृथ्वी और सबका मालिक भी एक है। उस परमात्मा को अहंकार त्यागकर सच्ची भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है। इसमे जाति पाति आड़े नहीं आती। जैसा कि कबीर ने कहा कि जाति पाति पूंछे नाहि कोई हरि को भजै तो हरि के होई। उक्त बात रविवार को शहर के संत कबीर आश्रत में आयोजित संत कबीर अमृतवाणी सत्संग में समिति प्रमुख एवं साईं कालेज के प्राचार्य डा0 एलसी अनुरागी ने कहीं।
उन्होंने कबीर का दोहा सुनाते हुए कहा कि जाति न पूंछो साधु की, पूंछ लीजिए ान, मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान। डा0 अनुरागी ने श्रीमद् भागवत गीता के अध्याय 6 के श्लोक संख्या 30 का वर्णन करते हुए कहा कि जो प्रभु की ओर सच्चे भाव से देखता है, प्रभु भी उस भक्त की ओर देखते हैं चाहे कोई किसी भी जाति का हो। सत्संग में पं0 हरीशंकर नायक ने कहा कि मनुष्य को अपने अंदर व्याप्त छः दोष काम क्रोध लोभ मोह अंहकार को समाप्त करने के बाद ही दूसरो के दोषों की ओर देखना चाहिए। उन्होंने कबीर दोहा सुनाया कि बुरा न मिलया कोय, जो दिल खोजा अपना मुझसे बुरा न कोय।
पं0 जगदीश रिछारिया ने भजन मन फूला फूला फिरे, जगत में कैसा नाता रे की व्याख्या करते हुए कहा  कि यह एक प्रसिद्ध भजन है, जो संत कबीर द्वारा रचित है। इसका अर्थ है कि मन संसार में इधर उधर भटकता रहता है, इसका संसार से क्या संबंध है?  यह भजन सांसारिक मोह माया और मनुष्य के नश्वर जीवन पर प्रकाश डालता है। शिक्षक सुरेक्ष सोनी ने भजन मन लागा मोरो यार फकीरी भजन सुनाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। सत्संग में वरिष्ठ कवि हरिश्चंद्र वर्मा ने अंधविश्वस समाप्त करने के लिए कबरी पर कविताएं प्रस्तुत की, वहीं कामत प्रसाद चौरसिया ने भी कबीरी दोहे सुनाएं। अधिवक्ता सुनीता अनुरागी ने कहा कि कबीर के विचार समाज में शांति सद्भावना बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इस मौके पर प्रदीप शर्मा, मयंक नायक, रामऔतार सैन सहित तमाम कबीरी भक्त मौजूद रहे।


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