टीकमगढ़। देश में जहां बच्चों की संभावनाएं और संवेदनाएं दोनों दम तोड़ रही हैं। शिक्षा में संवाद, मानसिक परामर्श और मानवीयता की जगह खाली है। जब तक हम शिक्षा को जीवन से नहीं जोड़ेंगे, तब तक यह व्यवस्था सफल नहीं, घातक सिद्ध होती रहेगी।शिक्षा संस्थान अब केवल डिग्रियों की फैक्ट्री बनते जा रहे हैं, राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार 2021 में 13,000 से अधिक विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। यह संख्या भारत में शिक्षा के नाम पर होने वाली त्रासदी की भयावहता को दर्शाती है। समस्या बहुत गहरी है और इसका समाधान केवल "शोक प्रकट करने" या "नियमन बनाने" से नहीं होगा। पवनघुवारा ने विज्ञप्ति में बताया गोरतलब है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 भारत में एक महत्वपूर्ण कानून है,निशुल्क शिक्षा,अनिवार्य शिक्षा,6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए प्रारंभिक शिक्षा ,शिक्षक-छात्र अनुपात,बुनियादी सुविधाएं,
बच्चों के अधिकारों की रक्षा,इसके अलावा, अधिनियम में यह भी प्रावधान है,प्रवेश और उपस्थिति,गैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों पर रोक,शिक्षकों की भूमिका,
इस अधिनियम का उद्देश्य समाज में समानता और समावेशिता को बढ़ावा देना है, और यह सुनिश्चित करना है कि हर बच्चा बिना भेदभाव के शिक्षा प्राप्त कर सके। जहां देश में यह महत्वपूर्ण अधिनियम भी हो पर स्थिति परिस्थिति आज कहा खड़ी दिखाई दे रही है विचारणीय अवश्य है । शिक्षा का उद्देश्य जीवन को समझना, आत्मविश्वास विकसित करना, जीवन में सक्षम बनाना,और हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना होना चाहिए।अगर हम यह नहीं कर सके, तो हर वर्ष हजारों रोशनी बुझती रहेंगी, और हम केवल मोमबत्तियां जलाकर अफ़सोस करते रहेंगे।
आज जो स्कूलों में छत गिर रही है, वह सिर्फ सीमेंट और सरिए की बनी नहीं थी—वह हमारे भरोसे, हमारी ज़िम्मेदारी और हमारे संविधान की आत्मा की छत थी। जब वो गिरी, तो यह संकेत था कि लोककल्याण का वादा अब केवल कागज़ पर बचा है। शिक्षा को फिर से जीवनमूल्य आधारित बनाना होगा — जहां विद्यार्थी केवल डिग्री नहीं, उद्देश्य पाएं; केवल नौकरी नहीं, पहचान पाएं, और केवल पढ़ाई नहीं, जीने का विश्वास पाएं, हमारा देश तभी शिक्षित माना जाएगा ।

