टीकमगढ़। कलेक्टर
विवेक श्रोत्रिय ने 18 मार्च 2025 मंगलवार के दिन जिला चिकित्सालय का औचक निरीक्षण किया तथा व्यवस्थाओं का जायजा लिया। इस दौरान कलेक्टर श्री श्रोत्रिय ने जिला चिकित्सालय स्थित ट्रामा सेंटर, ओपीडी, एनआरसी, गहन षिषु चिकित्सा कक्ष, महिला वार्ड सहित विभिन्न वार्डाें का निरीक्षण किया तथा आवष्यक निर्देष दिये। निरीक्षण के दौरान उन्होंने चिकित्सालय में भर्ती मरीजों के परिजनों से चर्चा की तथा व्यवस्थाओं के संबंध में जानकारी ली। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को साफ-सफाई सहित अन्य सभी व्यवस्थाओं के संबंध में दिषा-निर्देष दिये। तत्पष्चात उन्होंने चिकित्सालय में निर्माणाधीन कार्याें का भी निरीक्षण किया तथा सभी कार्य गुणवत्तापूर्ण कराने के निर्देष दिये।
इस अवसर पर सिविल सर्जन डाॅ. अमित शुक्ला, सहायक प्रबंधक डाॅ. अंकुर साहू, डाॅ. सिद्धार्थ रावत सहित संबंधित अधिकारी तथा जिला चिकित्सालय का स्टाफ उपस्थित रहा।----- हालात----- जिला अस्पताल में लगातार स्थितियां गड़बड़ रहती हैं जहां मरीजों को उनकी इच्छा के अनुरूप शासन जिला प्रशासन के नियम निर्देशों के अनुसार सुविधाओं और उनकी संतुष्टि के हिसाब से इलाज नहीं मिल पाता है जिम्मेवार लगातार इस ओर उदासीन दिखाई देते हैं जिसके चलते जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं में गड़बड़ झाला रहता है और बेचारे आर्थिक स्थितिययों से कमजोर मरीज मजबूरी में जो मिलता है अस्पताल की सुविधाओं में उसी में संतुष्टि कर लेते हैं जहां उनकी यह एक मजबूरी भी रहती है। अच्छे और पैसे वाले लोग तो प्राइवेट डॉक्टरों के यहां चले जाते हैं लेकिन कमजोर वर्ग ग्रामीण क्षेत्र से आए मरीज तो जिला अस्पताल में ही दिखाते हैं जहां उनकी यह मजबूरी भी रहती है।------- निजी डिस्पेंसरियों की रहती है चिंता जिला अस्पताल की परवाह कम----- जिला अस्पताल में पदस्थत डॉक्टर ज्यादातर अपनी निजी डिस्पेंसरियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं और जिला अस्पताल में तो वह केवल अपनी ड्यूटी फॉर्मेलिटी के तौर पर करते दिखाई देते हैं जिनमें से कुछ-एक डॉक्टर तो ऐसे हैं कि जिनके बंगलो पर इतनी भीड़ लगती है कि लोगों को नंबर लगाना पढ़ते हैं उसके बाद भी लोगों को घंटो इंतजार करना पड़ता है वही डॉक्टर जो अपने घरों पर मरीजों की लाइन लगवाते हैं जिला अस्पताल में वह केवल नाम मात्र और फॉर्मेलिटी के लिए ही अपनी ड्यूटी करने आते हैं क्योंकि जो उन्हें अपनी निजी डिस्पेंसरियो में मिलता है उससे शायद वह बहुत ज्यादा खुश रहते हैं जबकि उन्हें अपनी ड्यूटी और कर्तव्यों का शायद उतना कोई मोह नहीं है,और ना ही जिला अस्पताल की उन डॉक्टरों को उतनी परवाह रहती है। अपने- अपने बंगलो पर मरीजों को देखकर एवं मन माफिक फीस लेकर उन्हें ज्यादा खुशी मिलती है,जबकि अगर कर्तव्य के अनुसार ईमानदारी और लगन से जिला अस्पताल में मरीजों को वह देखें तो जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली भी सुधर जाएगी और लोगों के मन से जिला अस्पताल के प्रति जो विश्वास टूटता है वह भी जुड़ा रहेगा।----कुछ-एक कलेक्टरों की कार्य प्रणाली के चलते कुछ समय के लिए सुधरी थीं व्यवस्थाएं------- वैसे तो जिला अस्पताल में लगातार मरीजों के द्वारा ऐसी शिकायतें मिलती हैं कि जिला अस्पताल में सही और समय से शासन जिला प्रशासन के अनुसार सुविधाऐं नहीं मिलती हैं लेकिन पूर्व में कुछ-एक कलेक्टरों ने इस कार्य प्रणाली को बदलने का पूरा प्रयास किया था और उसमें सक्रिय भूमिका भी निभाई थी कलेक्टर प्रियंका दास ने अपने कार्यकाल में जिला अस्पताल में लगातार भ्रमण किये और वह बिना बताए,बिना किसी सूचना के आकस्मिक जिला अस्पताल पहुंच जाती थीं जिसके चलते उनके कार्यकाल में जिला अस्पताल की व्यवस्थाएं काफी हद तक सुधर गई थीं जहां कलेक्टर प्रियंका दास भी पहुंच कर मरीजों से और अस्पताल के जिम्मेवारों से डायरेक्ट बात कर तमाम व्यवस्थाओं का जायजा लिया करती थीं। जहां जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए जिला प्रशासन को एक बड़ी चुनौती ही रहती है।

