टीकमगढ़। बचपन मानव जीवन की नींव होता है। बचपन अब किताबों से नहीं, स्क्रीन की चमक से आकार ले रहा है।" यह वाक्य अब सिर्फ साहित्यिक प्रतीक नहीं रहा, बल्कि हमारे समाज की वास्तविकता बन चुका है। याद रखना चाहिए कि आज के बच्चे कल का समाज तय करेंगे। अगर वे अभी से वर्चुअल दुनिया के भ्रम में खो जाएँगे, तो उन्हें वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने की ताकत नहीं मिल पाएगी। एक ऐसा समाज तैयार होगा जो स्क्रीन पर जीता होगा, लेकिन जीवन की सच्चाईयों से दूर होगा। अगर उस नींव में सोशल मीडिया की दरारें भर जाएँगी, तो ऊपर खड़ी होने वाली इमारत कभी मजबूत नहीं बन सकेगी। गोरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया ने यह संदेश दुनिया को दिया है कि बच्चों को संरक्षित करना केवल पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं, राष्ट्र की नीति होनी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया की संसद पहले ही फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक और एक्स जैसे प्लेटफार्मों को 16 साल से कम आयु के बच्चों के लिए प्रतिबंधित कर चुकी है। अब यूट्यूब को भी इसी दायरे में शामिल किया गया है। यह दुनिया का पहला कानून है जो बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर इतनी स्पष्टता और कठोरता के साथ यह नीति 10 दिसंबर से लागू हो रही है,और इसका उल्लंघन करने पर संबंधित प्लेटफार्मों पर नियमों के मुताबिक उस पर 5 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाया जाएगा यह कदम बच्चों को ऑनलाइन दुनिया के नकारात्मक प्रभावों से बचाने के लिए उठाया गया है। स्क्रीन का शिकंजा भारत को भी अब इंतज़ार नहीं करना चाहिए। अगर बचपन स्क्रीन में खो गया, तो मानवीय समाज खुद अपने भविष्य से रूठ जाएगा , श्रीमती प्रियंका पवनघुवारा ने अनुरोध किया कि यह समय है जब भारत सरकार भी एक स्पष्ट और सख्त नीति बनाए कि 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया और मनोरंजक प्लेटफार्म से दूर रखा जाएगा। साथ ही, कंटेंट फिल्टरिंग, स्क्रीन टाइम लिमिट, और आयु सत्यापन जैसी तकनीकों को अनिवार्य किया जाए।भारत जैसे देशों में यह मुद्दा और अधिक गंभीर हो जाता है। डिजिटल लत अब नशे की तरह फैल चुकी है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, नींद की कमी, एकाग्रता में गिरावट और रिश्तों से दूरी जैसी समस्याएँ अब आम हो चुकी हैं। सिर्फ उनकी आँखों और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक विकास भी बाधित होता है।भारत को चाहिए कि वह इस विषय को गंभीरता से ले और भविष्य की पीढ़ियों को सिर्फ डिजिटल दक्ष नहीं, बल्कि संतुलित, संवेदनशील और सुरक्षित नागरिक बनाए।
अगर बचपन स्क्रीन में खो गया, तो मानव खुद अपने भविष्य से रूठ जाएगा : श्रीमती प्रियंका पवनघुवारा
July 31, 2025
टीकमगढ़। बचपन मानव जीवन की नींव होता है। बचपन अब किताबों से नहीं, स्क्रीन की चमक से आकार ले रहा है।" यह वाक्य अब सिर्फ साहित्यिक प्रतीक नहीं रहा, बल्कि हमारे समाज की वास्तविकता बन चुका है। याद रखना चाहिए कि आज के बच्चे कल का समाज तय करेंगे। अगर वे अभी से वर्चुअल दुनिया के भ्रम में खो जाएँगे, तो उन्हें वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने की ताकत नहीं मिल पाएगी। एक ऐसा समाज तैयार होगा जो स्क्रीन पर जीता होगा, लेकिन जीवन की सच्चाईयों से दूर होगा। अगर उस नींव में सोशल मीडिया की दरारें भर जाएँगी, तो ऊपर खड़ी होने वाली इमारत कभी मजबूत नहीं बन सकेगी। गोरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया ने यह संदेश दुनिया को दिया है कि बच्चों को संरक्षित करना केवल पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं, राष्ट्र की नीति होनी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया की संसद पहले ही फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक और एक्स जैसे प्लेटफार्मों को 16 साल से कम आयु के बच्चों के लिए प्रतिबंधित कर चुकी है। अब यूट्यूब को भी इसी दायरे में शामिल किया गया है। यह दुनिया का पहला कानून है जो बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर इतनी स्पष्टता और कठोरता के साथ यह नीति 10 दिसंबर से लागू हो रही है,और इसका उल्लंघन करने पर संबंधित प्लेटफार्मों पर नियमों के मुताबिक उस पर 5 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाया जाएगा यह कदम बच्चों को ऑनलाइन दुनिया के नकारात्मक प्रभावों से बचाने के लिए उठाया गया है। स्क्रीन का शिकंजा भारत को भी अब इंतज़ार नहीं करना चाहिए। अगर बचपन स्क्रीन में खो गया, तो मानवीय समाज खुद अपने भविष्य से रूठ जाएगा , श्रीमती प्रियंका पवनघुवारा ने अनुरोध किया कि यह समय है जब भारत सरकार भी एक स्पष्ट और सख्त नीति बनाए कि 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया और मनोरंजक प्लेटफार्म से दूर रखा जाएगा। साथ ही, कंटेंट फिल्टरिंग, स्क्रीन टाइम लिमिट, और आयु सत्यापन जैसी तकनीकों को अनिवार्य किया जाए।भारत जैसे देशों में यह मुद्दा और अधिक गंभीर हो जाता है। डिजिटल लत अब नशे की तरह फैल चुकी है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, नींद की कमी, एकाग्रता में गिरावट और रिश्तों से दूरी जैसी समस्याएँ अब आम हो चुकी हैं। सिर्फ उनकी आँखों और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक विकास भी बाधित होता है।भारत को चाहिए कि वह इस विषय को गंभीरता से ले और भविष्य की पीढ़ियों को सिर्फ डिजिटल दक्ष नहीं, बल्कि संतुलित, संवेदनशील और सुरक्षित नागरिक बनाए।
Tags

