टीकमगढ़। 15 अगस्त 1947 आज़ादी के 79वां साल आज हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, भारत की ताकत उसकी विविधता है। अब हम अपने भविष्य के निर्माता होंगे। आर्थिक मोर्चे पर भारत ने लंबी दूरी तय की है, हम तकनीक के युग में जी रहे हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने बोलने की आज़ादी को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। लेकिन इसी आज़ादी का दुरुपयोग भी बढ़ा है—झूठी खबरें, नफ़रत फैलाने वाले संदेश, और डिजिटल विभाजन ने समाज में नई खाइयाँ बना दी हैं। हमारे यहां लोकतंत्र का मतलब अक्सर सिर्फ़ चुनाव रह गया है। हर पाँच साल में वोट डालने को ही हम अपनी भागीदारी मान लेते हैं, लेकिन उसकी आवाज़ सिर्फ़ चुनावी भाषणों में नहीं, नीतियों और फैसलों में भी सुनी जाए। शिक्षा मंत्रालय के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि भारत में पंद्रह लाख से अधिक प्राथमिक और डेढ़ लाख से अधिक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हैं। बीते नौ वर्षों में देश भर में नवासी हज़ार से अधिक सरकारी विद्यालय बंद हो चुके हैं।शिक्षा आज़ादी की असली नींव है। बिना मजबूत और समान शिक्षा व्यवस्था के हम एक जागरूक और सक्षम नागरिक समाज नहीं बना
सकते।स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हालात चुनौतीपूर्ण हैं। कोई नागरिक इलाज की कमी से अपनी जान न गंवाए, और स्वास्थ्य सेवाएं केवल पैसे वालों के लिए न हों। यह याद रखना होगा कि बेरोज़गार युवा सिर्फ नौकरी के लिए आवेदन नहीं करते, वे देश के भविष्य की बुनियाद रख रहे होते हैं। अगर हम उन्हें ही यूँ दर-दर भटकाकर थका देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ किस व्यवस्था पर भरोसा करेंगी। हर टूटता हुआ पुल हमें चेतावनी देता है यह सिलसिला नियमों की कमी से नहीं, नियत की कमी प्रलोभन का परिणाम बहुत गहरा होता है। विकास और पर्यावरण संतुलन के बीच सामंजस्य बैठाना आज के भारत के लिए अनिवार्य है। जब ठोस परिणाम सामने नहीं आते, तो यह संदेह स्वाभाविक है कि पूरी प्रक्रिया कहीं न कहीं किसी रणनीति से प्रेरित हो रही है। जो कि किसी भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। हमें राजनीति में पारदर्शिता, न्यायपालिका में स्वतंत्रता, मीडिया में निष्पक्षता और समाज में समानता सुनिश्चित करनी होगी। वह भारत होगा जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने बलिदान दिया था। राजनीतिक आज़ादी हमारी यात्रा की शुरुआत थी, हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है—क्योंकि आने वाले भारत की पहचान हमारे वर्तमान के फैसलों से तय होगी।देशभक्ति केवल एक दिवस की भावना नहीं हो सकती,वह एक निरंतर जागरूकता है।


