टीकमगढ़। भारत में पशुपालन केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार है। देश में जहाँ 20 करोड़ से अधिक गौवंश और करोड़ों अन्य पशु हैं, वहीं पशु चिकित्सकों की भारी कमी गंभीर चिंता का विषय बन गई है।
हर चौथा पद रिक्त
देशभर में स्वीकृत 38,916 पशु चिकित्सक पदों में से 10,839 पद खाली हैं। यह लगभग 28 प्रतिशत रिक्तता दर्शाता है। यानी हर चौथा पद खाली पड़ा है। नतीजा यह है कि किसानों की आय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर सीधा संकट मंडरा रहा है।
केवल इलाज नहीं, रोकथाम भी आवश्यक
पशु चिकित्सक न सिर्फ बीमार पशुओं का इलाज करते हैं, बल्कि
संक्रामक बीमारियों की रोकथाम
टीकाकरण
कृत्रिम गर्भाधान
प्रजनन परामर्श
आधुनिक तकनीकों का प्रसार
में भी अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी कमी से छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका सबसे अधिक प्रभावित होती है।
बीमारियों से निपटना मुश्किल
मुंहपका-खुरपका, ब्रूसेलोसिस, बर्ड फ्लू जैसी संक्रामक बीमारियाँ समय पर नियंत्रण न मिलने से फैलती हैं। टीकाकरण कार्यक्रम भी धीमे हो जाते हैं और ज़ूनोटिक बीमारियों जैसे रैबीज़ व एवियन फ्लू का खतरा बढ़ जाता है।
हेल्पलाइन और मोबाइल यूनिट्स
किसानों के लिए 1962 टोल-फ्री हेल्पलाइन और लाइवस्टॉक हेल्थ एंड डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 8191 मोबाइल वेटरनरी यूनिट्स कार्यरत हैं। ये गाँव-गाँव जाकर पशुपालकों को सेवाएँ देती हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ये केवल अस्थायी उपाय हैं, स्थायी समाधान नहीं।
समस्याएँ और चुनौतियाँ
ग्रामीण सेवा में पशु चिकित्सकों की अनिच्छा
शैक्षणिक संस्थानों की सीमित संख्या
वेतन व सुविधाओं का अभाव
नए पदों का सृजन न होना
समाधान की राह
विशेषज्ञों का कहना है कि—
नए कॉलेज खोले जाएँ, सीटें बढ़ाई जाएँ
आधुनिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए
ग्रामीण सेवा के लिए प्रोत्साहन (भत्ता, आवास, परिवहन सुविधा) दिया जाए
केंद्र और राज्य सरकारें संयुक्त कोष बनाकर भर्ती प्रक्रिया तेज करें
आत्मनिर्भर भारत के लिए जरूरी
देश यदि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल करना चाहता है, तो पशुपालन क्षेत्र को मजबूत करना अनिवार्य है। पशु चिकित्सकों की भारी कमी इस विकास यात्रा में सबसे बड़ी रुकावट है।

