टीकमगढ़। 1 सितंबर 2025 को जब भारत डाक की रजिस्टर्ड डाक सेवा औपचारिक रूप से बंद होगी, तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होगा, बल्कि एक पूरे युग की विदाई होगी। यह वह सेवा थी, जिसने पीढ़ियों को जोड़कर रखा, रिश्तों को संभाला और संवाद को सुरक्षित पहुँचाने की परंपरा निभाई।
डाकिये की घंटी से जुड़ी यादें
वह पीढ़ी जिसने डाकिये की साइकिल की घंटी सुनकर अपने दिन की शुरुआत की, उनके लिए यह खबर भावनात्मक है।
रजिस्टर्ड डाक के साथ—
रिश्तों की प्रतीक्षा और संवाद का भरोसा जुड़ा था।
हर पत्र कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक था।
गाँव और शहर, नागरिक और शासन के बीच यह सुरक्षित सेतु था।
रजिस्टर्ड डाक की विशेषता
यह कभी खोती नहीं थी, कभी भटकती नहीं थी।
उसका पंजीकरण उसकी सुरक्षा था।
उसकी पावती प्राप्तकर्ता के दिल को संतोष देती थी।
भावनाओं का प्रहरी
रजिस्टर्ड डाक केवल चिट्ठी नहीं थी, बल्कि रिश्तों और विश्वास की गवाही थी।
उसने हमें जोड़ना सिखाया—
शब्दों से
भावनाओं से
प्रतीक्षा से
और विश्वास से
एक युग को प्रणाम
अब जब रजिस्टर्ड डाक विदा ले रही है, तो यह केवल एक सेवा का अंत नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक पृष्ठ बंद होना है।
आज की विदाई दरअसल उस युग को प्रणाम है—
उस सादगी को
उस धैर्य को
उस अपनापन को
जिसे रजिस्टर्ड डाक ने वर्षों तक अपने कंधों पर ढोया।
भले ही अब डाकघर बदल जाएँ, डाकिए डिजिटल हो जाएँ और पत्र इतिहास बन जाएँ, लेकिन रजिस्टर्ड डाक हमारी यादों और दिलों में सदा जीवित रहेगी।

