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फ्रेम की पीढ़ी बनता युवा वर्ग : इतिहास की गहराई से दूर हो रहा समाज, संघर्ष की गाथा भूली, तस्वीरों की दुनिया में खोया युवा: श्रीमती प्रियंका पवनघुवारा


 🔹 शहीदों का बलिदान और साहित्यिक योगदान बना आज़ादी की गाथा

🔹 मोबाइल-इंटरनेट की लत से चेतना हुई सतही

🔹 प्रकृति व संस्कृति की रक्षा ही भविष्य का आधार

टीकमगढ़। भारत का इतिहास केवल सुखद घटनाओं की लड़ी नहीं रहा है, इसमें युद्ध, संघर्ष, विद्वेष और विभाजन की पीड़ा भी दर्ज है। 1857 से 1947 तक का स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं था, बल्कि शहीदों और महापुरुषों का त्याग और बलिदान भी रहा।

भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खाँ जैसे वीरों ने अपने जीवन का हर क्षण देश को समर्पित कर दिया। वहीं कवि, लेखक और कलाकार केवल दर्शक नहीं रहे, बल्कि आज़ादी के आंदोलन को दिशा देने वाले बने। यही कारण है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवार और आंदोलनों की गाथा नहीं रहा, बल्कि साहित्य और संस्कृति का भी इतिहास बना।

चेतावनी की घड़ी

1990 के बाद जन्मी पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि उनके पास सूचनाओं का अंबार तो है, पर आत्मसत्य नहीं। मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया ने उन्हें इतिहास की गहराई से काटकर केवल सतही फ्रेमों और क्लिप्स तक सीमित कर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युवा इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो वे न केवल वर्तमान, बल्कि भविष्य भी खो देंगे।

विशेष बॉक्स

जीवन को सुरक्षित रखो — यह केवल चेतावनी नहीं, बल्कि एक प्रार्थना है।”

जल को शुद्ध रखें

पेड़ों की रक्षा करें

जीव-जंतुओं को सुरक्षित रखें

भीड़ का हिस्सा बनने से बेहतर है सही रास्ते का यात्री बनना

प्रकृति और संस्कृति का संदेश

संवाद में यह भी कहा गया कि प्रकृति की रक्षा करना ही भविष्य की मुस्कान की गारंटी है। जब खेत हरे-भरे रहेंगे, पशु-पक्षी जीवित रहेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रहेंगी।

सही रास्ता वही है जो भारतीय संविधान, लोकतंत्र और हमारी महान संस्कृति की ओर ले जाता है।



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