टीकमगढ़।भारत में अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती रही है कि डॉक्टरों की लिखावट इतनी उलझी होती है कि फार्मासिस्ट या मरीज को समझ ही नहीं आता कि कौन-सी दवा, कितनी मात्रा में और कितने समय तक लेनी है। ऐसे में गलत दवा या गलत खुराक से मरीज की हालत बिगड़ जाना आम बात है। कई बार तो यह लापरवाही मौत तक का कारण बन चुकी है। यह स्थिति केवल छोटे शहरों या ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है। बड़े-बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों में भी प्रिस्क्रिप्शन का यह संकट मौजूद है। लिहाज़ा हाईकोर्ट का हस्तक्षेप एक जीवन रक्षक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। यह विषय केवल चिकित्सकीय नहीं बल्कि सामाजिक भी है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अदालत ने सही कहा कि मरीज को अपनी बीमारी और इलाज की जानकारी मिलना उसका मौलिक अधिकार है। यदि प्रिस्क्रिप्शन ही अस्पष्ट और अधूरी जानकारी वाला हो तो यह अधिकार स्वतः ही बाधित होता है। इस संदर्भ में यह आदेश केवल चिकित्सा पद्धति के तकनीकी सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक अधिकारों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को भी निर्देश दिया है कि मेडिकल कॉलेजों में छात्रों को साफ-सुथरी लिखावट और स्पष्ट प्रिस्क्रिप्शन की ट्रेनिंग दी जाए। यह कदम बहुत अहम है क्योंकि आने वाले समय में वही छात्र डॉक्टर बनेंगे। अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी नीति बनाने का निर्देश दिया है। यदि सरकार इस आदेश को गंभीरता से लागू करती है तो यह न केवल मरीजों के जीवन की सुरक्षा करेगा बल्कि स्वास्थ्य सेवा में पारदर्शिता और विश्वास को भी मजबूत करेगा। अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि प्रिस्क्रिप्शन की स्पष्टता स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी सुधार लाती है। पश्चिमी देशों में डॉक्टरों द्वारा हाथ से लिखे पर्चे अब लगभग अतीत की बात हो चुके हैं। अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों में ज्यादातर अस्पतालों और क्लिनिकों में ई-प्रिस्क्रिप्शन ही मानक बन चुका है। भारत में भी डिजिटल इंडिया मिशन और आयुष्मान भारत डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड को बढ़ावा दिया जा रहा है। हाईकोर्ट का आदेश इन पहलों को और गति देगा। डॉक्टरों की लिखावट अब केवल मज़ाक या व्यंग्य का विषय नहीं रह गई, बल्कि यह सीधे-सीधे जीवन और मृत्यु का प्रश्न है। अदालत ने मरीज के अधिकार और डॉक्टर की जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से जोड़ा है। यदि यह आदेश पूरे देश में लागू हो जाए तो न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधरेगी बल्कि मरीज और डॉक्टर के बीच विश्वास भी मजबूत होगा। चिकित्सा का पहला उद्देश्य जीवन बचाना है और यदि लिखावट जैसी साधारण-सी चीज़ इसमें बाधा बने, तो यह चिकित्सा के धर्म और कर्तव्य दोनों के विपरीत है। भारत स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

