Type Here to Get Search Results !
पाए सभी खबरें अब WhatsApp पर Click Now

मनुष्य को जाति पाति भूलकर रहना चाहिए प्रेमपूर्वक : समिति प्रमुख



0 कबीर आश्रम में आयेजित सत्संग कार्यक्रम में प्रस्तुत किए गए भजन
शुभ न्यूज महोबा। शहर के मोहल्ला कटकुलवा पुरा स्थित कबीर आश्रम में प्रत्येक रविवार की भांति इस बार भी संत कबीर अमृतवाणी सत्संग समिति प्रमुख की अध्यक्षता में संगीतमय सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सत्संग में वक्ताओं ने सभी मनुष्यों से भेदभाव भुलाकर मिलजुल कर रहने पर जोर दिया गया साथ ही कबीर के दोहा, भजन और श्रीमद् भागवत कथा के श्लोकों के माध्यम से ईश्वर की भक्ति करने पर प्रकाश डाला गया।
सत्संग की शुरूआत करते हुए कबीर भक्तों ने सर्वप्रथम कबीर वंदना जय कबीर जय कबीर जय गुरू कबीरा प्रस्तुत की। इसके बाद समिति प्रमुख डॉ. एलसी अनुरागी ने कहा कि कुरान, गीता, बाइबिल व रामायन आदि धार्मिक ग्रंथों का सार है कि ईश्वर एक है और सभी मनुष्य उनकी संतान है, इसलिए जाति पाति का भेदभाव भूलाकर सभी प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। जैसा कि कबीर ने भी कहा है कि कुआं एक है, पानी भरे अनेक; बर्तन में ही भेद है, पानी सब में एक“ अर्थात विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक मतभेदों के बावजूद सभी में मौजूद एक ही परम सत्य की ओर संकेत करता है, और बताता है कि भेद केवल शारीरिक या बाहरी आवरणों में है, न कि आत्मा या उस मूल तत्व में। पंडित हरीशंकर नायक ने शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान, तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन। की व्याख्या करते हुए कहा कि जो शील स्वभाव का होता है मानो वो सब रत्नों की खान है, क्योंकि तीनों लोकों की माया शीलवन्त व्यक्ति में ही निवास करती है।
मौदहा से आए भजन गायक गंगादीन प्रजापति ने भजन सुनाया कि मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं, हे पावन परमेश्वर मेरे मन ही मन शरमाऊं सुनाया। जगदीश रिछारिया एवं संगम सिंह ने कार्तिक गीत भई न ब्रज की मोर गिरधारी मोरो बारो गिरन परै प्रस्तुत किया। सुखराम स्नेही ने स्वरचित रचना बाहर से रंग रुप जगत का लगता कितना प्यारा है सुनाकर लोगों को मंत्र मुग्ध कर दिया। कामता प्रसाद चौरसिया ने भजलो श्री भगवात जगत में कुछ दिन के मेहमान भजन प्रस्तुत किया। पंडित आशाराम तिवारी ने श्रीमद् भागवत गीता के अध्याय दो के श्लोक संख्या 38 सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ की व्याख्या करते हुए कहा कि सुख-दुःख, लाभ हानि और जय पराजय को समान या एक समान मानकर, अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। इस मौके पर राजाराम चौरसिया, लखनलाल, संतोष अनुरागी आदि भक्तों ने भी अपने अपने विचार व्यक्त किए।



- - इसे भी पढ़ें - -

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad